मैंने अमिताभ बच्चन जी के बारे में अनेकों लेख पढ़े की किस कदर लोग उनके दीवाने थे। मैं भी उनकी अदाकारी की कायल हूं पर हमारे जमाने में यानी 90 के दशक में अमिताभ बच्चन नहीं शाहरुख खान का परचम था।  मैं और मेरे जैसी कई लड़कियां शाहरुख जैसे पति की कल्पना करते करते जीती आई हैं। फिल्मों के शुरुआत में दी गयी वैधानिक चेतावनी “ये सब काल्पनिक है, इसका निजी जिन्दगी से कोई लेना देना नहीं” को हम हमेशा से ही अनदेखा करती आई थी। जब फिल्म दिलवाले दुल्हनिया ले जायेगे  का ये गाना सुना था “मेरे ख्वाबों में जो आए, आके मुझे छेड़ जाए, उससे कहो कभी सामने तो आए।” तो मैं इस गाने पर बहुत थिरकती थी। काजोल की तरह मैं भी अपने सपनों के शाहरुख खान को इमेजिन करके मन ही मन खूब सपनें संजोती। सोचती थी कोई मुझे भी कहे आई लव यू क क क किरन और जब मैं डरती या किसी मुसीबत में होती तो कोई कहे ” किसका है तुमको इंतज़ार मैं हूं ना”। तब पता नहीं था पति इतने रोमांटिक नहीं होते पति तो “रब ने बना दी जोड़ी” के सुरेंदर सुरी जैसे होते हैं। खैर शाहरुख खान की बात करते है।  हमे विज्ञान, गणित, इतिहास, भूगोल स्कूल ने पढ़ा दिया। अच्छे कर्म बुरे कर्म  भी  कुछ मोरल साइंस ने और कुछ मां बाप ने पढ़ा दिए। पर प्यार का पाठ तो हमे शाहरुख खान ने ही पढ़ाया। उन की फिल्मों ने प्यार करने वालो को कितने ही गुरु मंत्र दिए है ।  उनकी पहली फिल्म शायद मैंने दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे देखी होगी उसका वो डायलॉग अगर वो तुझसे प्यार करती है तो पलट कर ज़रूर देखेगी पलट, पलट…. अरे भाई लोग दीवाने हो गए थे इसके। ये था मेरा पहला पाठ मैं अक्सर अपने क्रश को देख यही कहा करती थी पलट, पलट पर वो कमब्खत कभी पलटा ही नहीं। दूसरा पाठ दिया फिल्म कुछ कुछ होता है ने  “प्यार दोस्ती है । अगर वो मेरी सबसे अच्छी दोस्त नहीं बन सकती, तो मैं उससे कभी प्यार कर है नहीं सकता।” और हम सब ने उनकी बात मान ली। प्यार नहीं दोस्त ढूंढने लगे हम। फ्रेंडशिप बैंड बांधने का चलन भी तो उसी फिल्म से शुरू हुआ था। तीसरा पाठ पढ़ाया उनकी फिल्म मोहब्बतें ने ,”मोहब्बत भी ज़िंदगी की तरह होती है। हर मोड़ आसान नहीं होता, हर मोड़ पर खुशी नहीं मिलती। पर जब हम ज़िंदगी का साथ नहीं छोड़ते फिर मोहब्बत का क्यों छोड़े।” कितनी गहरी बात कही थी।

उसी फिल्म ने हमे ये भी सिखाया ” कोई प्यार करे तो तुमसे करे, तुम जैसे हो वैसे करे। कोई तुमको बदल कर प्यार करे तो वो प्यार नहीं सौदा करे। और साहिबा प्यार में सौदा नहीं होता।”

उन्होंने कहा हमने मान लिया और सोचा प्यार करेंगे तो सच्चा। किसी के लिए खुद को नहीं बदलेंगे और इसी चक्कर में हमे कोई मिला ही नहीं। क्यूंकि हम जैसे थे वैसे किसी को पसंद आए ही नहीं और जिनको हम पसंद आए वो हमे पसंद नहीं आए। चौथा पाठ पढ़ाया फिल्म ओम शांति ओम ने, उसने तो जैसे जीने का मक़सद दे दिया हो “अगर किसी चीज को दिल से चाहो तो पूरी कायनात उसे तुम से मिलाने की कोशिश में लग जाती है। ” “ज़िंदगी भी फिल्मों की तरह होती है एंड में सब ठीक हो जाता है और अगर ठीक ना हो तो पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त।”और हैप्पी एंडिंग के चक्कर में शादी ही हो गई।   अब पति शाहरुख खान तो नहीं हो सकते क्यूंकि वो तो है अलबेला हजारों में अकेला पर चलिए पुराने ज़माने के अमरीश पूरी जैसे पति भी नहीं है वो। खयाल रखते है, सम्मान देते है और प्यार भी करते हैं। h फिल्मों और असल ज़िंदगी में कुछ तो फर्क होगा। पर ये सच है शाहरुख खान ने हमें बहुत हसीन सपने दिखाए। चलते चलते कितनी ही बार दीवाना बनाया। कभी देवदास कभी डॉन तो कभी बादशाह बन कर दिया कभी खुशी कभी गम। सिखाया प्यार करो जब तक है जान क्यूंकि क्या पता कल हो ना हो।

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