ॐ नारे और नारे और नारे और नारे
ॐ सबकुछ, सबकुछ, सबकुछ
ॐ कुछ नहीं, कुछ नहीं, कुछ नही

एंड क्रेडिट रोल होते वक्त बैकग्राउंड में चलने वाली बाबा नागर्जुन की ये कविता ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ का सबसे स्ट्रॉन्ग पार्ट है. फिल्म की स्टोरी है प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह के एक दशक के कार्यकाल की. और साथ में उनके सोनिया गांधी के साथ रिलेशन की.

# क्या द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर एक प्रोपेगेन्डा फिल्म है –
ऐसा कहना गलत होगा कि ‘ये एक प्रोपेगेन्डा फिल्म नहीं है’. सही कथन ये होगा कि ‘ये एक प्रोपेगेन्डा फिल्म बनने में फेल हो गई’. दोनों बातों में ‘एफर्ट्स’ का अंतर है. यानी एफर्ट्स तो पूरे किए गए लेकिन वो एफर्ट्स पूरी तरह असफल हो गए. तब जबकि फिल्म की स्क्रिप्ट, उसका ट्रीटमेंट, उसके किरदार सब पॉलिटिकल हैं.

बीजेपी इस फ़िल्म का प्रमोशन क्यों कर रही थी ये समझ के बाहर की बात है क्योंकि जिन विपक्षी नेताओं को एक दो सीन में बहुत एक्टिव रूप में दिखाया है वे अब खुद अपनी ही पार्टी में ‘मनमोहन’ वाले रोल को निभा रहे है. यानी सालों से खामोश हैं और उन्हें भी संसद में ठीक वैसे ही नहीं बोलने दिया जाता, जैसे कि फिल्म के एक सीन में मनमोहन सिंह को दिखाया गया है.

# क्या द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म है –
ये एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ या डॉक्यूमेंट्री बनते-बनते भी रह गई. वो इसलिए क्यूंकि अस्सी प्रतिशत चीज़ें आपको पहले से ही मालूम होती हैं, उनको भी जिनकी राजनीति में ज़्यादा रूचि न हो. रही बात 20% चीज़ों की, जिनकी हम दर्शकों को पहले से जानकारी नहीं है, वो सब या तो फिक्शनल दिखाई गई हैं – जैसे राहुल गांधी का ऑर्डिनेंस को फाड़ना जो कभी हुआ ही नहीं. या फिर ये चीज़ें इतनी ज़ल्दीबाज़ी में या इतनी सतही तरीके से बताई गई हैं कि हमको रेफरेंस समझने के लिए किताबों, अख़बारों या उस वक्त की मैगज़ीन्स की शरण में जाना पड़ता है. जैसे कपिल सिब्बल से लेकर प्रणव मुखर्जी और आडवानी, अटल, अन्ना के फटाफट आ-जा रहे चेहरे, टू-जी, कोयला स्कैम आदि.

तस्वरी – द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर के यू ट्यूब ट्रेलर का स्क्रीन शॉट
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के रोल में अनुपम खेर – द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर के यू ट्यूब ट्रेलर का स्क्रीन शॉट
# क्या द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर एक बायोपिक है –
अगर इस फिल्म को मनमोहन सिंह की बायोपिक मानने की कोशिश करें तो हमें ये ध्यान में रखना होगा कि किसी बायोपिक में मेन करैक्टर के निजी विचार और उसकी पर्सनल लाइफ सबसे ज़्यादा मायने रखती है. लेकिन फिल्म में दोनों ही चीज़ें मिसिंग है.

फिल्म में मनमोहन से अधिक संजय बारू छाए हुए हैं. यूं अगर ये किसी की बायोपिक लगती है तो संजय बारू की. वो ही एक नैरेटर और एक हीरो बने रहते हैं. जितने ज़्यादा मनमोहन कमज़ोर दिखते हैं उतना बारू स्ट्रॉन्ग. लेकिन संजय भी कहीं ऐसे फैक्ट्स या जानकारियां नही दे पाते कि लगे ये उनके निजी अनुभवों पर आधारित है. वे खुद लास्ट में बताते है कि बुक रिलीज़ होने के बाद उनके मनमोहन के साथ टॉकिंग टर्म बिगड़ गए थे. इन और ऐसी ही कई बातों से ये बारू की प्रोपोगेन्डा फिल्म उनको महिमामंडित करती फिल्म ज़्यादा लगती है.

कई जगह तो यही लगता है कि सरकार के दो सिरे अगर थे भी तो एक कांग्रेस अध्यक्ष तो दूसरा संजय बारू जो कि न कोई राजनेता था न ही ब्यूरोक्रेट. वो प्रधानमंत्री के मीडिया मैनेजमेंट करने वाला अधिकारी भर थे. लेकिन वही प्रधानमंत्री की तरफ से सारे गेम खेल रहे थे. ये संभव नहीं लगता.

# मूवी क्लासेज़ के लिए या मासेज़ के लिए –
एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर फ़िल्म को ‘एक्सीडेंटल मूवी’ भी कहा जा सकता है. बेशक इसके सेट्स, डायरेक्शन, एक्टिंग, आर्ट-वर्क, मेक-अप, सब बड़ी तसल्ली से और रिसर्च के साथ किए लगते हैं, लेकिन फिर भी फिल्म की ओवरऑल फील ज़ल्दबाज़ी वाली ही है.

बैकग्राउंड म्यूज़िक शुरू में बड़ा अच्छा और सस्पेंस क्रिएट करता लगता है, लेकिन जैसे-जैसे हम फिल्म में आगे बढ़ते हैं तो इसका भी छलावा हमें पता लग जाता है, और हम फिल्म से कुछ और एक्स्पेक्ट नहीं करते.

के सरा सरा वाले मात्र एक ह्यूमर सीन, भीष्म पितामह वाले मात्र एक डायलॉग और नागर्जुन वाले मात्र एक गीत से फिल्म इंटरटेनमेंट या मासेज़ वाली कैटगरी में भी नहीं आती और आधी अधूरी, या केवल एक ही किताब को रिसर्च मानकर बनाई गई ये फिल्म क्लासेज़ वाली कैटगरी में भी नहीं आ पाती.

संजय बारू के रोल में अक्षय खन्ना – द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर के यू ट्यूब ट्रेलर का स्क्रीन शॉट
संजय बारू के रोल में अक्षय खन्ना – द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर के यू ट्यूब ट्रेलर का स्क्रीन शॉट
# क्या द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर एक फिक्शल और एंटरटेनिंग फिल्म है –
कॉमर्शियल फिल्म दर्शकों से ये उम्मीद करती है कि वो फिल्म देखने आने से पहले ढेर सारी स्टडी करके आएं, और यहीं पर ये एक फिल्म के रूप में, एक एंटरटेनर के रूप में भी फेल हो जाती है. आपको खीज होती है, जब आप समझ नहीं पाते क्या चल रहा है. ये मेरे द्वारा देखी गई ऐसी पहली फिल्म थी जिसके ट्रेलर में फिल्म से ज़्यादा कंटेट था. यानी अगर आप ट्रेलर को देखकर पूरी फिल्म का रिव्यू करने चलें तो कोई नहीं बता पाएगा कि आपने फिल्म नहीं देखी.

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– सोनिया गांधी का ये डायलॉग आप ट्रेलर में सुनते हैं लेकिन फिल्म में नहीं. ये उदाहरण है इस बात का कि न जाने ऐसे कितने ही डायलॉग हटाए गए होंगे, जिनके बारे में आम दर्शक को कभी पता नहीं चलेगा. कई जगह डायलॉग म्यूट किए गए हैं जो और ज़्यादा इरिटेट करते हैं. कई जगह किरदारों और घटनाओं की रियल फुटेज ली गई है, लेकिन ऐसा करना शुरुआत में तो अच्छा लगता है बाद में फील होता है कि भीड़, रैली वगैरह की रियल फुटेज तो ठीक लेकिन राहुल गांधी और आडवानी के लिए अगर एक्टर्स रखे गए हैं तो फिर उनकी रियल फुटेज क्यूं ली जा रही है. तब जबकि, जैसा कि हमने पहले ही कहा, ये कोई डॉक्यूमेंट्री तो है नहीं.

सोनिया गांधी के रोल में सुजैन – द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर के यू ट्यूब ट्रेलर का स्क्रीन शॉट
सोनिया गांधी के रोल में सुजैन – द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर के यू ट्यूब ट्रेलर का स्क्रीन शॉट

# और अंत में कुछ फ़िल्मी एस्पेक्ट्स –
सबसे पहले तो फिल्म को इस बात का क्रेडिट मिलना चाहिए कि इसमें सारे रियल नेम, रियल इंसिडेंट बिना बदले दिखाए गए हैं. ऐसा आज तक हम सिर्फ विदेशी फिल्मों में ही देखते आए थे. इंडिया में ऐसा कुछ होना सराहनीय कदम माना जाना चाहिए.

सारे एक्टर्स का मेकअप कमाल है. यूं हर कोई एक्टर नहीं किरदार लगता है. फिर चाहे वो सोनिया गांधी का किरदार निभा रहीं सुजैन बर्नट हों, मनमोहन का किरदार निभा रहे अनुपम खेर. आहना तो बिलकुल प्रियंका गांधी लग रही हैं और अर्जुन माथुर सामने से न सही लेकिन साइड फेस से राहुल गांधी ही लग रहे हैं.

ज़्यादातर सेट्स इनडोर हैं और नेटफ्लिक्स की वेब सीरीज़ ‘हाउस ऑफ़ कार्ड्स’ या ऐसे ही किसी पॉलिटिकल ड्रामा की याद दिलाते हैं. मतलब अच्छे और कन्विंसिंग हैं. निर्देशक विजय रत्नाकर का भी ओवर ऑल काम इतना अच्छा है कि अगर इस फिल्म का कोई और सब्जेक्ट होता तो उन्हें चारों ओर से अपने डेब्यू डायरेक्शन के लिए तारीफें मिलतीं. यूं उनकी अगली फिल्मों पर नज़र रहनी चाहिए. स्क्रीनप्ले में जो थोड़े बहुत झोल हैं वो रियल फुटेज से पूरे करने के प्रयास किए गए हैं लेकिन ये और ज़्यादा भद्दा लगता है.

एक्टिंग के मामले में अनुपम खेर की एक्टिंग, भाव भंगिमा यकीनन ऐसी लगती है कि उन्होंने इसपर काफी मेहनत की है. लेकिन कहीं-कहीं उनका मनमोहन को कॉपी करना एक मिमिक्री सरीखा भी लगता है. ऐसा तब नहीं होता जब कोई बिलकुल अनजान चेहरा इस रोल के लिए लिया जाता. ऐसा हुआ है अमुपम खेर की अपनी एक इमेज और उनके पिछले कुछ प्रोजेक्ट्स के चलते. सबसे धांसू काम किया है अक्षय कुमार ने, वो वाकई में एक अंडर डॉग हैं इस फिल्म में उनके रोल, उनकी एक्टिंग, एक्सप्रेशन वगैरह को देखकर पता लग जाता है.

राहुल गांधी के रोल में अर्जुन माथुर – द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर के यू ट्यूब ट्रेलर का स्क्रीन शॉट
राहुल गांधी के रोल में अर्जुन माथुर – द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर के यू ट्यूब ट्रेलर का स्क्रीन शॉट
और अंत में मेरा सवाल यही है कि अगर राजनैतिक कारणों से ही फिल्म बनानी है, तो फिर सेंसर बोर्ड के रास्ते क्यों जाना? इसका तो यही मतलब है कि आप लोगों को इसके फिल्म होने का भरोसा देना चाहते हैं. कि फिल्म है, चुनावी रैली नहीं. खैर –

ॐ इसी पेट के अंदर समा जाए सर्वहारा
हरिः ॐ तत्सत् हरिः ॐ तत्सत्

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