बच्चों को होने वाला टीबी बड़ों की तुलना में अलग होता है. इनमें वयस्कों की तरह खांसी या इसके साथ खून आना प्रमुख लक्षण नहीं होता. कम आयु में ही यदि समय पर रोग का उपचार न किया जाए तो यह अपंगता व मौत का भी कारण बन सकता है. ऐसे में यदि ठीक देखभाल व बचाव का ध्यान रखा जाए तो बहुत ज्यादा हद तक बच्चों में इस रोग की संभावनाको घटाया जा सकता है.

लक्षण
भूख कम लगना, हल्का बुखार रहना, वजन घटना, सांस फूलना, छाती में दर्द के साथ बुखार, पेट फूलना या बिना दर्द के गांठ उभरना, जोड़ों में सूजन, दस्त,स्वभाव में चिड़चिड़ापन, प्रभावित अंग से जुड़े लक्षण दिखते हैं.

फैलाव
शिशु में यह बैक्टीरिया दूषित वातावरण या आसपास किसी संक्रमित आदमी के सम्पर्क में आने से फैलता है. इनमें सबसे पहले फेफड़े या इसका कोई भी भाग प्रभावित होने कि सम्भावना है. इसके बाद बैक्टीरिया लसिका वाहिकाओं के जरिए गिल्टियों में प्रवेश करने के बाद अन्य अंगों पर प्रभाव छोड़ता है. इनमें मुख्यत: फेफड़े, मस्तिष्क या इसकी झिल्ली, किडनी, प्लीहा, हड्डी व कोशिकाओं से जुड़े टीबी के मुद्दे ज्यादा देखे जाते हैं.

6-8 माह तक चलता इलाज
इलाज 6-8 माह के बीच पूर्ण रूप से हो जाता है. लेकिन अधिक कमजोरी या गंभीर स्थिति में सालभर तक दवाएं दी जाती हैं.

कब तक असर
बच्चे की आयु जितनी कम होगी, उतनी ही रोग की संभावना ज्यादा होती है. इसका कारण निर्बल इम्यूनिटी है. शरीर की प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता बैक्टीरिया को 6-7 सप्ताह तक बढ़ने और फैलने से रोकती है. लेकिन लक्षणों को नजरअंदाज करने, लापरवाही बरतने और निर्बल इम्यूनिटी के कारण समस्या गंभीर होने लगती है. दुनिया स्वास्थ संगठन के अनुसार बच्चों का शुरुआती अवस्था में ही उपचार महत्वपूर्ण है. वर्ना रोग के बढ़ने पर भविष्य में इससे कई अन्य रोगों की संभावना बनी रहती है.

सावधानी
बच्चों को भीड़भाड़ वाले स्थानों पर ले जाने से बचें. दूषित खानपान और पेय पदार्थ से परहेज कराएं.

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